सपनों से हकीकत तक: टैरिफ वॉर और भारत की चुनौतियां 

1. टैरिफ वॉर का सुखद भ्रम और हकीकत: 

यह मान लेना कि अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाने के बाद भारत पर कोई ठोस असर नहीं पड़ेगा, या फिर टीवी चैनलों की भांति इसे “बेहतरीन अवसर” बताकर उत्सव का माहौल बना देना, वस्तुतः आर्थिक वास्तविकताओं से आँखें मूँद लेने के समान है। टैरिफ केवल कागज़ पर लिखी संख्या नहीं होते- इनका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष असर उद्योग, व्यापार और रोज़गार के हर स्तर पर महसूस होता है। भारत का अमेरिकी बाजार में निर्यात मूल्य 2023-24 में लगभग 78 अरब डॉलर था, जिसमें गारमेंट, जेम्स-एंड-ज्वेलरी, केमिकल्स और इंजीनियरिंग गुड्स जैसी श्रेणियाँ अग्रणी हैं। इन पर शुल्क वृद्धि का मतलब सीधा ऑर्डर में गिरावट, प्रतिस्पर्धी देशों द्वारा बाजार हिस्सेदारी छीन लेना, और अंततः उत्पादन व रोजगार में गिरावट है।

इतिहास भी यही चेतावनी देता है। 1930 के Smoot-Hawley Tariff Act के बाद अमेरिका और उसके व्यापारिक साझेदार देशों के बीच प्रतिशोधी टैरिफ युद्ध छिड़ा, जिसके परिणामस्वरूप वैश्विक व्यापार में लगभग 65% की गिरावट आई और महामंदी (Great Depression) का संकट और गहराया। अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्रियों का सर्वमान्य निष्कर्ष यह भी है कि टैरिफ का जवाब टैरिफ से देना न केवल व्यापार को सीमित करता है, बल्कि नवाचार और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता के निर्माण की दिशा से ध्यान भटका देता है। 

अतः विवेकपूर्ण नीति यही होगी कि हम भावनात्मक या राजनीतिक प्रतिक्रिया देने के बजाय, घरेलू बाजार क्षमता में वृद्धि, प्रतिस्पर्धात्मक विनिर्माण क्षमता, तकनीकी नवाचार, और नए बाजारों में विविधीकरण के माध्यम से दीर्घकालिक समाधान तलाशें, ताकि किसी भी बाहरी टैरिफ झटके का सामना मजबूती से किया जा सके।

2. टीवी स्टूडियो की खुशी से ज़मीनी बेचैनी तक:

भारतीय टीवी स्टूडियो में आजकल एक उत्सव जैसा माहौल पेश किया जा रहा है-मानो अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाने के बाद भारत ने कोई ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली हो और अब अमेरिका महंगाई के बोझ तले ढह जाएगा। यह एक सुविधाजनक और लोकप्रिय नैरेटिव है, लेकिन ज़मीनी तस्वीर कहीं अधिक जटिल और गंभीर है। 

यदि असली स्थिति जाननी हो तो चमकदार टीवी स्टूडियो के बजाय गारमेंट उद्योग, लेदर एक्सपोर्ट, जेम्स एंड ज्वेलरी सेक्टर और अन्य निर्यातकों से बात करनी होगी। इन उद्योगों में इस समय असहज बेचैनी है—किसी का शिपमेंट बंदरगाह पर अटका है, किसी का बहु-मिलियन डॉलर ऑर्डर रद्द होने के कगार पर है। अरबों रुपये के कारोबार और लाखों परिवारों की रोज़ी-रोटी इस संकट से जुड़ी है। एक फैक्ट्री के बंद होने का असर मालिक से लेकर मजदूर, ट्रांसपोर्टर, पैकिंग यूनिट और आसपास की छोटी दुकानों तक पर पड़ता है।

भारतीय परिधान निर्यातक संघ (AEPC) के अनुसार, गारमेंट सेक्टर में अकेले 4.5 करोड़ लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं। एक फैक्ट्री के ठप पड़ने से केवल मालिक ही नहीं, बल्कि सैकड़ों मजदूर, ट्रांसपोर्टर, पैकिंग यूनिट, बटन-ज़िप-थ्रेड सप्लायर और यहां तक कि आस-पास के चाय-नाश्ते की दुकान तक प्रभावित होती है। वर्ल्ड बैंक की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि जब भी निर्यात में 10% की गिरावट आती है, तो भारत जैसे विकासशील देशों में लाखों नौकरियां खतरे में पड़ जाती हैं।

यह बात भी हमें याद रखनी होगी कि टैरिफ के जवाब में टैरिफ लगाना भी कोई स्थायी समाधान नहीं, बल्कि एक आत्मघाती दौड़ की शुरुआत है, जिसमें हार अंततः सभी की होती है।अमेरिका का क्या होगा, यह अपनी जगह है, लेकिन हमारी पहली प्राथमिकता अपने देश के उन लाखों परिवारों की होनी चाहिए जो इस टैरिफ वार से सीधे प्रभावित हैं।

3. महाशक्ति होने का स्वप्न और हकीकत 

हाल तक भारत को विश्व की भावी महाशक्ति के रूप में देखा जाता रहा था। हेनरी किसिंजर ने अपनी चर्चित पुस्तक World Order में भारत को 21वीं सदी के वैश्विक संतुलन का प्रमुख स्तंभ बताते हुए उल्लेख किया कि इसकी सभ्यतागत गहराई, लोकतांत्रिक ढाँचा और बढ़ती आर्थिक क्षमता इसे निर्णायक भूमिका निभाने में सक्षम बनाते हैं। उस दौर में थॉमस फ्रीडमैन जैसे विश्लेषकों ने भारत को “flat world” की प्रतिस्पर्धा में एक अग्रणी खिलाड़ी माना, जबकि जेफ्री सैक्स ने इसकी जनसंख्या-शक्ति और युवा आबादी को आर्थिक चमत्कार का मूल आधार बताया।

1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद आई तेज़ वृद्धि, आईटी क्रांति, अंतरिक्ष व परमाणु तकनीक में उपलब्धियाँ, और बढ़ता मध्यम वर्ग, इन सबने एक ऐसी आशा पैदा की थी कि भारत शीघ्र ही विश्व मंच पर शीर्ष पर पहुँचेगा। परंतु हाल के वर्षों में अपेक्षित संरचनात्मक सुधारों की कमी, शिक्षा और अनुसंधान में निवेश की गिरावट, तथा विनिर्माण में प्रतिस्पर्धा की कमी ने इस स्वप्न को धुंधला कर दिया है, और यह प्रश्न अब अनुत्तरित है कि क्या भारत अभी भी उस दिशा में अग्रसर है।

4. भारत और चीन की निर्यात संरचना में अंतर

आज भारत, चीन की तुलना में वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बहुत पीछे छूट चूका है। जहाँ चीन ने पिछले तीन दशकों में शिक्षा, अनुसंधान और विनिर्माण में सतत व विशाल निवेश कर अपनी अर्थव्यवस्था को उच्च तकनीक और नवाचार की दिशा में मोड़ा, वहीं भारत ढांचागत सुधारों की कमी, अनुसंधान पर न्यूनतम व्यय और विनिर्माण में ठहरी हुई प्रगति के कारण पिछड़ गया है। नोबेल विजेता जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ और अर्थशास्त्री जेफ्री डी. सैक्स ने चेताया है कि यदि भारत ने अब भी दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश नहीं किया, तो वह “मिसिंग द बस” की स्थिति में पहुँच जाएगा-एक ऐसी स्थिति जहाँ अगले कई दशकों तक वैश्विक आर्थिक शिखर की ओर लौटना कठिन होगा। चीन के 28% से अधिक विनिर्माण हिस्सेदारी की तुलना में भारत का विनिर्माण में मात्र 14–15% हिस्सा, इस अंतर को स्पष्ट कर देता है। यह अंतर केवल आँकड़ों का नहीं, बल्कि अवसरों की कमी का प्रमाण है।

भारत के निर्यात की संरचना आज भी मुख्यतः लो-टेक और श्रम-प्रधान उत्पादों पर आधारित है- जैसे रेडीमेड परिधान, साधारण इंजीनियरिंग वस्तुएँ, कम तकनीक वाले ऑटो-पार्ट्स, और प्राथमिक कृषि उत्पाद। इनकी विशेषता यह है कि इन्हें कोई भी अन्य प्रतिस्पर्धी देश—जैसे बांग्लादेश, वियतनाम, मलेशिया या यहाँ तक कि कंबोडिया- मामूली मूल्य अंतर और त्वरित आपूर्ति के साथ अमेरिका और यूरोप को उपलब्ध करा सकता है। इस कारण, वैश्विक बाज़ार में भारत को प्रतिस्थापित करना अपेक्षाकृत सरल है। इसके विपरीत, चीन ने अपने निर्यात पोर्टफोलियो में हाई-एंड और तकनीकी रूप से जटिल उत्पादों का दबदबा कायम किया है- जैसे अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, 5G और एआई आधारित उपकरण, दुर्लभ पृथ्वी खनिज (Rare Earth Minerals), और उन्नत मशीनरी – जिनका विकल्प न तो आसानी से और न ही सस्ते में उपलब्ध हो सकता है। 

5. शिक्षा, अनुसंधान और विनिर्माण में निवेश का अंतर – भारत बनाम चीन

1990 के दशक से चीन ने शिक्षा और अनुसंधान एवं विकास (R&D) में जिस पैमाने पर निवेश किया, उसने उसकी औद्योगिक और तकनीकी क्षमता को विश्व में अग्रणी बना दिया। R&D पर हम काफी कम खर्च कर रहे हैं इस वजह से हम अपने मानव पूंजी निर्माण में लगातार पिछड़ रहे हैं।

चीन ने GDP का 2.5 % से अधिक अनुसंधान में लगाया है, जबकि भारत इस मोर्चे पर केवल 0.7% के आसपास खर्च करता है। विश्व बैंक और OECD के आंकड़े बताते हैं कि यह अंतर किसी भी उभरती हुई अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता में निर्णायक साबित होता है। यही कारण है कि चीन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर निर्माण, क्वांटम कंप्यूटिंग, और नवीकरणीय ऊर्जा जैसी उच्च तकनीकी क्षेत्रों में वैश्विक नेतृत्व की स्थिति हासिल कर चुका है।

परिणामस्वरूप, चीन AI, सेमीकंडक्टर, और नवीकरणीय ऊर्जा में अग्रणी बन गया, जबकि हमारे स्टार्टअप इकोसिस्टम का झुकाव अब भी फूड डिलीवरी और लो-टेक सेवाओं की ओर है। भारत की वर्तमान स्टार्टअप संस्कृति में ऊर्जा का अधिकांश हिस्सा फूड डिलीवरी, लॉजिस्टिक्स और अन्य लो-टेक सेवाओं में केंद्रित है, जबकि उच्च-प्रौद्योगिकी और बौद्धिक संपदा आधारित उद्योगों में निवेश नगण्य है। कम शिक्षा और सीमित तकनीकी दक्षता के आधार पर केवल ऐसे ही कार्य किए जा सकते हैं, जिनमें उच्च कौशल या नवाचार की आवश्यकता न हो- जैसे साधारण परिधान तैयार करना, बिना सिलाई वाले कपड़े बनाना और बेचना, चीन से आयातित रसायनों के सहारे पेटेंट फ्री हो चुकी सस्ती जेनेरिक दवाएं तैयार करना (जिसमें दो-ढाई दशक पहले हुए आर्थिक सुधारों के साथ-साथ ओबामा की हेल्थकेयर योजना ने भी मांग बढ़ाने में योगदान दिया), आभूषणों की कटाई-तराश, या मोबाइल पार्ट्स की असेम्बलिंग।

ये सभी “लो-स्किल्ड” कार्य हैं, और स्वभावतः इनकी sustainability life भी सीमित होती है, क्योंकि इन्हें करने के लिए दर्जनों अन्य प्रतिस्पर्धी देश पहले से ही कतार में खड़े हैं। जैसे ही हमें कभी किसी भी वजह से ज़रा-सा झटका लगता है, ये देश आसानी से हमारी जगह ले सकते हैं।

इसके विपरीत, “हाई-एंड” उत्पाद- जो उच्च स्तरीय अनुसंधान और उन्नत कौशल से ही संभव हैं—का विकल्प न तो आसानी से और न ही कम समय में तैयार किया जा सकता है। यही कारण है कि जिन देशों के पास ऐसा नवाचार-आधारित उत्पादन ढांचा है, उनकी वैश्विक सौदेबाज़ी क्षमता कहीं अधिक मजबूत है

हाल ही में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी एक बयान में इसी सच्चाई की ओर संकेत किया। उनका सार यह था कि हमारे अधिकांश सफल Startups का झुकाव क्लाउड किचन, फूड डिलीवरी, और सामान्य उपभोक्ता वस्तु वितरण जैसी सेवाओं की ओर है; जबकि हाई-टेक्नोलॉजी पर आधारित स्टार्टअप्स- जैसे कभी इंफोसिस जैसे आईटी दिग्गज या तो अपेक्षित संख्या में सामने नहीं आ रहे, या आने पर भी वांछित परिणाम देने में विफल हैं। यह स्थिति अस्वाभाविक नहीं है, क्योंकि हमारे वर्तमान अनुसंधान और उच्च शिक्षा के स्तर से हम भोजन बनाने और पहुँचाने जैसे क्षेत्रों में तो क्रांति ला सकते हैं, किंतु विश्व स्तरीय हाई-एंड तकनीकी उत्पादों के विकास में नहीं। 

भारत में नई शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) का एक प्रमुख उद्देश्य शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च को बढ़ाकर जीडीपी का 6% करना है, ताकि स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक बुनियादी ढांचे, गुणवत्तापूर्ण शिक्षक प्रशिक्षण, और अनुसंधान क्षमताओं में व्यापक सुधार किया जा सके। यह व्यय बढ़ा तो है मगर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में समुचित प्रयाश नहीं हो पा रहे। 2025 में उच्च शिक्षा पर किया गया सरकारी व्यय 2024 की तुलना में लगभग 17% घट गया है, जो न केवल NEP 2020 के घोषित लक्ष्य के विपरीत है बल्कि भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा की संभावनाओं के लिए भी खतरे की घंटी है।

यह कटौती ऐसे समय में हो रही है जब चीन, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देश उच्च शिक्षा और अनुसंधान पर अपने खर्च को लगातार बढ़ा रहे हैं, जिससे वे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और ग्रीन टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में अग्रणी बन रहे हैं। यह विडंबना है कि कभी हमने अत्यंत सीमित संसाधनों में भी अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, क्रायोजेनिक तकनीक और कंप्यूटर प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली थी, जबकि आज अधिक संसाधनों के बावजूद हम उस स्तर की छलांग लगाने में पीछे रह गए हैं।

परिणामस्वरूप, जहाँ चीन अगले दो दशकों के लिए तकनीकी प्रभुत्व की नींव डाल चुका है, वहीं भारत का औद्योगिक परिदृश्य अब भी ‘कैच-अप’ मोड में अटका हुआ है—और यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो हम वैश्विक प्रतिस्पर्धा में स्थायी रूप से पीछे छूट सकते हैं। यदि भारत उच्च शिक्षा और अनुसंधान में निवेश घटाता रहा, तो यह न केवल हमारी नवाचार क्षमता को सीमित करेगा, बल्कि हमें दीर्घकालिक आर्थिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेल देगा।

6. “लास्ट डिकेड एंड हाफ” : सुधारों की कमी

पिछले डेढ़ दशक (2010- 2024) भारत के लिए विनिर्माण क्षेत्र के विकास का स्वर्णिम अवसर हो सकता था, किंतु यह समय बड़े पैमाने पर Lost Decade and Half में बदल गया। जिस प्रकार 1991 में पी. वी. नरसिंहराव के नेतृत्व में ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ व्यापक आर्थिक सुधार लागू किए गए थे, उसी प्रकार के निर्णायक कदम इस अवधि में अपेक्षित थे। 1996 में हुए बड़े सुधारों के बाद 2000 के दशक में कुछ मझोले स्तर के सुधार हुए, परंतु 2009–2010 के पश्चात सुधारों की गति लगभग थम-सी गई और इस दिशा में राजनितिक इच्छाशक्ति का अभाव हावी रहा।

योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, जो स्वयं इन नीतिगत प्रक्रियाओं के निकट रहे हैं ने अपनी ही सरकार की एक तरह से आलोचना करते हुए इस जड़ता को सटीक शब्दों में परिभाषित किया था – “There is a strong consensus of weak reform” यह कथन भारत की आर्थिक नीति में लंबे समय से व्याप्त साहसहीन सहमति और ठहरे हुए दृष्टिकोण का आईना है।

इसके बाद जो भी परिवर्तन हुए, वे ज्यादातर “हाफ हार्टेड” और आधे-अधूरे रहे- ऐसे कि उनका ठोस और दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव होना असंभव था। परिणामस्वरूप, आज भी हम वही उत्पाद निर्यात कर रहे हैं जिन्हें हम 2009–2010 तक विकसित कर पाए थे; ना तो निर्यात संरचना में कोई उल्लेखनीय बदलाव आया ना ही मैन्युफैक्चरिंग में। इस दौरान सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा कई गुना और बढ़ गया। हम अपने ही उद्योगों को बंद कर, उन्हीं क्षेत्रों से संबंधित अधिक प्रतिस्पर्धी और बेहतर उत्पाद चीन से आयात करने लगे।

हाल के सालों में 2010 से 2024 तक का भारत का यह Lost Decade and Half आर्थिक इतिहास में उस समय के रूप में दर्ज होगा, जब वृद्धि के अवसर तो उपलब्ध थे, परंतु संरचनात्मक सुधारों के अभाव में उनका लाभ उठाया नहीं जा सका। विनिर्माण क्षेत्र, जो किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था की रीढ़ होता है, GDP में लगभग स्थिर या गिरते हिस्से के साथ जूझता रहा-2013–14 में इसका हिस्सा 16.7% था, जो 2023–24 में घटकर केवल 15.9% रह गया। 2010 से 2024 का Lost Decade and Half इस बात का उदाहरण है कि भारत ने कितने महत्त्वपूर्ण आर्थिक अवसर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में गंवा दिए।

2014 के बाद भारत की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया, जब देश में  दशकों तक चले गठबंधन सरकारों का दौर समाप्त हुआ और केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी। यह वह समय था जब देश के पास बड़े और संरचनात्मक सुधार लागू करने का दुर्लभ अवसर आया – ऐसे सुधार जो वर्षों से राजनीतिक अस्थिरता और गठबंधन की मजबूरियों के कारण टलते आ रहे थे। पूर्ण बहुमत ने सरकार को वह ताक़त दी थी जिससे वह कठिन और अलोकप्रिय, किंतु दीर्घकालिक हित में आवश्यक नीतिगत परिवर्तन ला सकती थी-चाहे वह विनिर्माण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के उपाय हों, श्रम कानूनों का सरलीकरण, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश का विस्तार, या कृषि एवं भूमि सुधार। किंतु इस अवसर का लाभ उठाने के बजाय, सुधार या तो सीमित दायरे में रहे, आधे-अधूरे लागू हुए, या राजनीतिक विवादों और अल्पकालिक लोकप्रियता की राजनीति में खो गए, जिससे संभावित परिवर्तनकारी लाभ देश को नहीं मिल सका।

Make in India जैसी महत्वाकांक्षी पहल के बावजूद, वास्तविक निवेश और रोजगार वृद्धि अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाई। विनिर्माण GVA की औसत वृद्धि दर मात्र 5.5% रही। निर्यात मोर्चे पर भी स्थिति कमजोर रही-भारत का वैश्विक मेर्केंडाइज निर्यात हिस्सा केवल 1.8% पर सिमटा रहा

2020 में भारत सरकार ने तीन कृषि अध्यादेश लाकर कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधार की मंशा दिखाई- मंडी व्यवस्था के बाहर बिक्री की स्वतंत्रता, अनुबंध खेती को कानूनी सुरक्षा, और भंडारण व स्टॉक पर लगी पाबंदियों में ढील। इन कदमों का उद्देश्य निजी निवेश आकर्षित करना और आपूर्ति श्रृंखला को आधुनिक बनाना था, जैसा कई विशेषज्ञ वर्षों से सुझा रहे थे। परंतु इन्हें बिना पर्याप्त संवाद, राज्यों की सहमति और किसानों की आशंकाओं को दूर किए लागू करने के राजनीतिक प्रभाव को बैलेंस करने की दृढ इछ्शक्ति की कमी के वजह से वापस लिए गए । अंततः 2021 में इनकी वापसी इस बात का प्रतीक बनी कि बड़े सुधार केवल नीति से नहीं, बल्कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और सहमति निर्माण की क्षमता से ही संभव हैं। सरकार के इस तरह नी-जर्क रिएक्सन ने भारत में आर्थिक सुधारों के पक्ष में जो माहौल पिछले तीन से अधिक दशकों में बना था  उसमे एक अविश्वास का माहौल भरा है.  

7. डेमोग्राफिक डिविडेंड बनाम डेमोग्राफिक बर्डन – मात्र डेढ़ दहाई का मौक़ा शेष 

हाल के दशकों में भारत को विश्व के विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं द्वारा भविष्य की महाशक्ति के रूप में देखा जाता रहा था, और इस उम्मीद की सबसे बड़ी नींव उसका विशाल डेमोग्राफिक डिविडेंड था। आज भी लगभग 66–67% आबादी कार्यशील आयु वर्ग (15–64 वर्ष) में है, जो किसी भी देश के लिए असाधारण अवसर है। किंतु यह खिड़की स्थायी नहीं है-अगले 25–30 वर्षों में यही बहुलांश आबादी वृद्धावस्था में प्रवेश कर जाएगी। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या प्रक्षेपण के अनुसार 2050 तक भारत की 20% से अधिक जनसंख्या 60 वर्ष से ऊपर होगी। उस समय यह जनसंख्या उत्पादकता का स्रोत नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा पर भारी आर्थिक बोझ बन जाएगी।

दुर्भाग्य से, वर्तमान युवा बल्ज का एक बड़ा हिस्सा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल और अवसरों के अभाव में पूर्ण क्षमता से योगदान नहीं दे पा रहा है। आज की परिस्थितियों में यह डेमोग्राफिक डिविडेंड, योजनाबद्ध निवेश और कौशल विकास के अभाव में, धीरे-धीरे डेमोग्राफिक बर्डन में बदलने का खतरा पैदा कर रहा है। जिस ऊर्जा और उत्पादक क्षमता को सही प्रशिक्षण और रोजगार के माध्यम से आर्थिक वृद्धि में बदला जा सकता है, वह आज भी एक बड़े हिस्से में निष्क्रिय पड़ी है। यदि अगले दो दशकों में भारत ने अपने युवाओं को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाने के लिए शिक्षा, कौशल और नवाचार में भारी निवेश नहीं किया, तो यह सुनहरा अवसर चूक जाएगा- और उसके बाद महाशक्ति बनने का सपना या अपोर्त्युनिती शायद लंबे समय तक केवल इतिहास के पन्नों में ही रह जाएगा।

भारत में पिछले एक दशक में शुरू किए गए स्किल इंडिया मिशन, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना और दर्जनों अन्य कौशल विकास कार्यक्रमों को लेकर शुरुआती उम्मीदें बड़ी थीं- ये योजनाएँ युवाओं को रोजगारोन्मुख कौशल देकर उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी बनाने का दावा करती थीं। लेकिन हकीकत यह है कि ये तथाकथित स्किल डेवलपमेंट पहल उच्च-स्तरीय तकनीकी क्षमता विकसित करने में लगभग विफल रही हैं। ए-आई, सेमीकंडक्टर डिजाइन, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसी हाई-एंड टेक्नोलॉजी के लिए जिस गहन प्रशिक्षण, अनुसंधान-आधारित शिक्षा और उद्योग-अकादमिक साझेदारी की ज़रूरत होती है, उसकी जगह इन योजनाओं ने अल्पकालिक, सतही और अक्सर बाज़ार की मांग से असंगत कोर्स थमा दिए। 

अक्सर यह प्रशिक्षण सिर्फ एक प्रमाणपत्र पाने तक सीमित रह गया है-एक काग़ज़ी उपलब्धि, जिसे पॉलिसी भाषा में पेपर टाइगर कहा जा सकता है। कई संस्थानों ने इसे सरकारी फंड हासिल करने का माध्यम बना लिया, और प्रशिक्षण केवल कागज़ों पर हुआ। जमीनी स्तर पर, यह एक ऐसा चक्र बन गया जिसमें न तो प्रशिक्षित युवाओं को सार्थक रोजगार मिला और न ही देश को वह तकनीकी बढ़त, जिसकी आवश्यकता वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिकने के लिए थी।

8. समाधान का मार्ग: आत्मनिर्भर और प्रतिस्पर्धी भारत की ओर

भारत के आर्थिक भविष्य को टिकाऊ और सशक्त बनाने का रास्ता केवल निर्यात पर अत्यधिक निर्भरता से हटकर घरेलू मांग और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण को बढ़ावा देने में है। कई शीर्ष अर्थशास्त्रियों के अनुसार, किसी भी स्थायी अर्थव्यवस्था की रीढ़ एक ऐसा मिडिल क्लास होता है, जिसकी क्रयशक्ति निरंतर बढ़ रही हो। एक मज़बूत और समृद्ध मध्यम वर्ग अपने उपभोग के ज़रिये उद्योगों को गति देता है, नए उद्यमों को जन्म देता है, और लाखों रोजगार पैदा करता है। भारत में फिलहाल लगभग 35 करोड़ लोग मध्यम वर्ग में गिने जाते हैं, लेकिन चीन की तुलना में यह आंकड़ा अब भी बहुत कम है—जहां 70 करोड़ से अधिक लोग मध्यम वर्ग का हिस्सा हैं।

इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए केवल पॉपुलिस्ट योजनाओं या 5 किलो अनाज बाँटने की राजनीति पर्याप्त नहीं है। जैसा कि नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने कहा था—“Development is about creating capabilities, not just delivering entitlements.” अर्थात्, विकास का सार नागरिकों की क्षमताओं का निर्माण है, केवल अधिकारों का वितरण नहीं। उच्च शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, और अनुसंधान एवं विकास (R&D) में बड़े और निरंतर निवेश के बिना यह संभव नहीं।

आज भारत GDP का मात्र लगभग 0.7% R&D में लगाता है, जबकि चीन 2.68 % और अमेरिका 3.4% से ऊपर निवेश करता है। इसका सीधा परिणाम यह है कि एआई, नवीकरणीय ऊर्जा, और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में भारत अब भी पिछलग्गू बना हुआ है। यदि हम केवल 5 किलो अनाज बाँटने की राजनीति तक सीमित रहेंगे और क्षमता निर्माण पर ध्यान नहीं देंगे, तो न वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक पाएँगे, न अपने नागरिकों के लिए स्थायी समृद्धि ला पाएँगे। 

अमेरिका द्वारा लादा गया यह टैरिफ युद्ध अवसर का संकेत नहीं, बल्कि हमारी नीतिगत कमजोरियों का दर्पण है – इसलिए, समाधान टैरिफ वॉर में जीतने का दिखावा करने में नहीं है, बल्कि अपनी संरचनात्मक कमजोरियों को पहचानकर दिशा बदलने में है। हमें एक ऐसे आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना होगा जिसमें घरेलू उद्योग वैश्विक मानकों पर प्रतिस्पर्धा कर सकें, मध्यम वर्ग की क्रयशक्ति निरंतर बढ़े, और शिक्षा-शोध के माध्यम से देश अपनी तकनीकी आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करे। यदि यह खिड़की अब चूक गई, तो जैसा कि कई अर्थशास्त्री चेतावनी दे चुके हैं, यह अवसर शायद आने वाले कई दशकों तक भारत के लिए वापस न आए।

(डॉ. सत्यदीप कुमार सिंह पेशे से एडवोकेट हैं और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (NUSRL) रांची में विज़िटिंग फैकल्टी हैं।)

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